सोमवार, 21 मई 2012

मां

मां












ब्लॉग पर पहली पोस्ट के लिए मेरे पास इससे बेहतर कोई
विषय नहीं था। मां यानी ऐसा अलफ़ाज़, जिसे परिभाषित
करने के लिए भाषा के सारे शब्द कम पड़ेंगे। इसके मायनों को
बयां किया जाए, तो सारी दुनिया के पेज कम पड़
जाएंगे। चंद मिनटों पहले जन्म लेने वाला बच्चा मां
की गोद में आकर रोना बंद कर देता हैभले उसकी आंखें
ठीक से ना खुली हों, वो मां के स्पर्श को बखूबी समझता है।
मां के प्रेम और त्याग की मिसाल दुनिया के किसी
और रिश्ते से नहीं दी जा सकती। इस्लाम में कहा गया है, कि
मां के कदमों के नीचे जन्नत होती है
इसकी व्याख्या है, कि मां की हर आज्ञा पर सिर झुकाना चाहिए
और वही काम  करना चाहिए, जिसमें मां की रज़ामंदी हो।
सूरदास ने मां  यशोदा और बाल कृष्ण के प्रेम को –
मैंया मोरी मैं नहीं  माखन खायों
मैंया मोरी मैं तो चंद्र खिलौना लेहौं
और...
मैंया मोरी दाऊ बहुत खिजैहों
-जैसी कविताओं में व्यक्त किया।
मां की अहमियत का बखान शायरों ने भी खूब किया है।
शायर मुनव्वर राणा ने मां पर
जज़्बाती शेर लिखे हैं। मुनव्वर का एक शेर है-
किसी को घर मिला हिस्से में, या कोई दुकां आई,
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई।
उनका एक और शेर है-
मुनव्वर मां के सामने कभी खुल कर नहीं रोना,
जहां बुनियाद रहती है, नमी अच्छी नहीं होती।
या फिर-
ऐ अंधेरे देख तेरा मुंह काला हो गया,
मां ने आंखें खोल दीं, घर में उजाला हो गया।
मां की हस्ती को बयां करने वाली शायरी की बात की जाए
तो ताहिर फ़राज़ को कैसे भूला जा सकता है। माई नाम से
लिखी गई उनकी एक नज्म बहुत मक़बूल हुई है-
अंबर की ये ऊंचाई
धरती की ये गहराई
तेरे मन में है समाईमाई ओ माई
तेरा मन अमृत का प्याला
यही काबा यही शिवाला
तेरी ममता पावनदाईमाई ओ माई
जी चाहे क्यों तेरे साथ रहूं
मैं बनके तेरा हमजोली
तेरे हाथ ना आऊं छुप जाऊं
यूं खेलूं आंख मिचौली
परियों की कहानी सुनाके
कोई मीठी लोरी गाके
कर दे सपने सुखदाईमाई ओ माई
संसार के ताने-बाने से
घबराता है मन मेरा
इन झूठे रिश्ते-नातों में
बस प्यार है सच्चा तेरा
सब दुख, सुख में ढल जाएं
तेरी बाहें जो मिल जाएं
मिल जाए मुझे ख़ुदाईमाई ओ माई
फिर कोई शरारत हो मुझसे
नाराज़ करूं फिर तुझको
फिर गाल पे थप्पी मार के तू
सीने से लगा ले मुझको
बचपन की प्यास बुझा दे
अपने हाथों से खिला दे
पल्लू से बंधी मिठाईमाई ओ माई
प्रतापगढ़ के रहने वाले इलाहाबाद में पढ़ाई पूरी करने वाले
युवा शायर इमरान अहमद ख़ान ने भी मां की अहमियत
को अलफ़ाज़ दिए हैं। प्रतापगढ़ में हुए एक मुशायरे में
उन्होंने ये शेर पेश किया, तो लोग झूम उठे-
अपने शहर की ताज़ी हवा लेके चला हूं,
हर मर्ज़ की यारों मैं दवा लेके चला हूं ।
मुझको यकीं है रहूंगा मैं तो कामयाब,
यारों मैं घर से मां की दुआ लेके चला हूं।