शनिवार, 18 अप्रैल 2015

शानदार 'वसीम बरेलवी'

उसूलों पे जो आंच आए तो टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हों तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है
नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाए
कहां से बचके चलना है कहां जाना ज़रूरी है
थके हारे परिंदे जब बसेरों के लिए लौटें 
सलीकामंद शाखों का लचक जाना ज़रूरी है
सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है
बहुत बेबाक आंखों में ताल्लुक टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है
मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
क्या इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है


                                                                     "वसीम बरेलवी"

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया...उजाले के पीछे की 'कालिख'



दो वक़्त की रोटी ना मिले सुकून से
ऐसी मीडिया से मैं तो बाज़ आया
ये शोरे-गुल क्यूं  कैसी ये बदहवासी
अब कौन सा चैनल किससे मात खाया

कोई हिर्स में डूबा है कोई फ़िक्रो ग़म में
कोई बोलता बहुत है कुछ जानता नहीं
कोई बॉस का क़रीबी फिर काम क्यूं करे
इस बेशरम जमात पे रोना आया

अहसास को पैरों तले हैं रौंदते ये लोग
मरने की छुट्टियों को भी टटोलते ये लोग
शीशों की सरहदों के ये बनावटी जुगनू
इनकी अना पे हमको तो हंसना आया

आगोश में इनके सदा रंगीन तितलियां
आंखों में चमकती हैं नोटों की गड्डियां
पाक पेशे की ये दाग़दार हस्तियां
सब माफ़ हैं इनकी गुस्ताख़ियां...