दो वक़्त की रोटी ना मिले सुकून से
ऐसी मीडिया से मैं तो बाज़ आया
ये शोरे-गुल क्यूं कैसी ये बदहवासी
अब कौन सा चैनल किससे मात खाया
कोई हिर्स में डूबा है कोई फ़िक्रो ग़म में
कोई बोलता बहुत है कुछ जानता नहीं
कोई बॉस का क़रीबी फिर काम क्यूं करे
इस बेशरम जमात पे रोना आया
अहसास को पैरों तले हैं रौंदते ये लोग
मरने की छुट्टियों को भी टटोलते ये लोग
शीशों की सरहदों के ये बनावटी जुगनू
इनकी अना पे हमको तो हंसना आया
आगोश में इनके सदा रंगीन तितलियां
आंखों में चमकती हैं नोटों की गड्डियां
पाक पेशे की ये दाग़दार हस्तियां
सब माफ़ हैं इनकी गुस्ताख़ियां...

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