सोमवार, 3 मार्च 2014

मौत रुला कर जाती है...




पच्चीस फ़रवरी के दिन मैं अपने घर इलाहाबाद में था...दोपहर के वक़्त मेरे पास लाइव इंडिया के पत्रकार अमान का फ़ोन आया...पता चला, कि उसकी मां की तबीयत बहुत ख़राब है...उन्हें नोएडा-सेक्टर 62 के फ़ोर्टिस अस्पताल में भर्ती किया गया है...मायूस अमान को मैंने हिम्मत दी...और नोएडा लौटने पर अस्पताल पहुंचने की बात कही...पहली मार्च को दोपहर एक बजे के क़रीब इलाहाबाद से नोएडा पहुंचा...नहा-धोकर दो बजे ऑफ़िस चला गया...दो मार्च को दोपहर बारह बजे के क़रीब अमान को फ़ोन किया...वो बेहद मायूस था...उसकी मां की हालत नाज़ुक थी...मैंने शाम तक अस्पताल पहुंचने की बात कही...अस्पताल जाने के लिए देर शाम ऑफ़िस से दो घंटे पहले ही निकल गया...साढ़े आठ बजे भास्कर न्यूज़ के अविनाश तिवारी के साथ अस्पताल पहुंचा...अमान को फ़ोन किया, तो उसने उठाया नहीं...लाइव इंडिया के ऐंकर चंदन सिंह को फ़ोन करने पर पता चला, कि दोपहर में अमान की मां गुज़र गईं...वो लोग मिट्टी के लिए मुरादाबाद रवाना हो गए...अब उसे दूसरा फ़ोन मिलाने की हिम्मत मुझमे नहीं बची थी...
 
दस बारह दिन के अंदर मुझे इस तरह की ये दूसरी ख़बर मिली थी...बीस फ़रवरी को राजस्थान पत्रिका-जयपुर के पत्रकार आरिफ़ ख़ान का मैसेज (सर...मैंने अपनी मां खो दी) भी मुझे अफ़सोस की ज़द में डुबो गया था...समझ में नहीं आ रहा था, कि बड़े भाई की तरह मानने वाले उस लड़के को क्या कह कर दिलासा दूं...

मौत ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच है...जाने वाला अपनी यादें छोड़कर जाता है...लेकिन उन यादों के सहारे जीने की बात कहना बेमानी है...मरने वाले की यादें हमेशा आंखों को नम करती हैं... मौत अफ़सोस देती है, लेकिन उसे टाला और नकारा नहीं जा सकता...ये कुदरत का निज़ाम है...नई ज़िंदगियां किलकारी मारकर ख़ुशियां बिखेरती हैं...और ज़िंदगी की तमाम धूप-छांव देखने वाला एक रोज़ इतनी बड़ी दुनिया को छोड़ सबसे लंबे सफ़र को निकल जाता है...लेकिन ये फ़लसफ़े किसी के ग़म को कम नहीं कर सकते...मैं इस बात को बख़ूबी जानता हूं...क्योंकि अभी एक साल भी नहीं बीते मेरी मां को गुजरे हुए...उस पाक रूह की याद जब-तब आंख भिगो जाती है...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें